पतंजलि संस्कृत संस्थान मध्य प्रदेश को जबलपुर हाईकोर्ट की फटकार!

निर्देशक प्रभातराज तिवारी की हटधर्मिता की मध्य प्रदेश में है चर्चा! मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा मंत्री के चहेते होने का प्रभातराज तिवारी को मिल रहा है लाभ! शासन को कोर्ट तक ले जाने का कार्य भी इन्ही की है देन। भाजपा सरकार और मंत्री को नही पड़ता है फर्क।
जबलपुर-मामला यह है कि पुष्पांजलि संस्कृत पुष्यतर माध्यमिक विद्यालय लक्ष्मी मार्केट जयन्त जिला सिंगरौली एवं अन्य 5 विद्यालय संचालको ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी जिसमे याचिकाकर्ताओं ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह याचिका दायर कर 27.06.2024 के आदेश को चुनौती दी है, जो महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान, भोपाल में उन छात्रों के प्रवेश पर रोक लगाता है, जिन्होंने उसी बोर्ड या स्कूल से कक्षा 9वीं या कक्षा 11वीं की पढ़ाई नहीं की है जो कि भेद भाव पूर्ण नीति है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की उड़ाई जा रही है धज्जियां!
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत संपूर्ण भारत के अन्य बोर्डों से 9वीं कक्षा पास करने वाले विद्यार्थी संस्कृत बोर्ड में कक्षा 10वीं में प्रवेश पाने के लिए पात्र हैं। वैसे ही 11 वीं कक्षा पास करने वाले विद्यार्थी 12वीं में प्रवेश पाने के पात्र होते हैं। केवल उन्हें अतिरिक्त विषय के रूप में संस्कृत बोर्ड में संस्कृत विषय लेना अनिवार्य होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दिशा-निर्देशों के आधार पर सभी राज्यों के बोर्डो को प्रवेश प्रक्रिया को संचालित करना अनिवार्य होता है परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति को दरकिनार करके अपनी मनमर्जी से प्रवेश नीति बनाकर लगभग 150 संस्थान में 10 हजार से अधिक बच्चों का भविष्य दाव पर लगाया जा रहा है। जिससे छात्रों के साथ शासन का लाखों रूपये का राजस्व का नुकसान हो रहा है।
भाजपा सरकार के उपमख्यमंत्रियों,सांसद, विधायक के पत्र का स्कूल शिक्षा मंत्री पर नही हुआ कोई असर!

इस मामले में पूर्व में ही उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा तथा रीवा सांसद जनार्दन मिश्र, मऊगंज मध्य क्षेत्र विधायक प्रदीप पटेल ने इस विषय को गंभीरता से विचार करने हेतु स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को पत्र द्वारा आग्रह किये जाने पर भी कोई सार्थक निर्णय नहीं निकला था।
एक ही अधिकारी के कंधे पर 3 प्रमुख संस्थान संचालन का दायित्व। शासन के पास नही है कोई अन्य योग्य अधिकारी!

महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान में 9 वर्षों से पदस्थ निर्देशक प्रभातराज तिवारी जो स्कूल शिक्षा मंत्री के चहते बताए जाते है के द्वारा मनमानी तरीके से अपनी मर्जी अनुसार महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान की प्रवेश नीति तैयार कराया गया है।
क्या म.प्र.शासन स्कूल शिक्षा विभाग में प्रभातराज तिवारी से योग्य अधिकारी नहीं हैं। एक ही अधिकारी 3 महत्वपूर्ण संस्थान में प्रमुख पद पर आसीन है।जिनका मूल पद लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल में उपसंचालक,महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान में निर्देशक एवं म.प्र. राज्य मुक्त स्कूल शिक्षा बोर्ड भोपाल में संचालक पद पर कार्यरत् हैं, दोनों बोडौँ के संचालन एक ही व्यक्ति/अधिकारी के द्वारा किया जा रहा है। जबकि शासन के नियमानुसार संबंधित अधिकारी को अपने मूल पद एवं विभाग में जाना अनिवार्य होता है का भी उलंघन किया जा रहा है।
प्रभातराज तिवारी अब चाहते है राज्यमंत्री दर्जा का पद!लगा रहे मंत्रालय के चक्कर!
विस्वस्त सूत्र से मिली जानकारी के अनुसार प्रभातराज तिवारी अपने तीन वर्ष की अतिरिक्त प्रतिनियुक्ति लेने के लिए मंत्री महोदय एवं मंत्रालय के चक्कर काटते हुए देखे गये हैं। अगर इनको प्रतिनियुक्ति नहीं मिलती है तो विकल्प के रूप में म.प्र. योग आयोग के अध्यक्ष पद पर पीठासीन होना चाहते हैं।
केवल यहां तक नहीं राज्य ओपन के संचालक तिवारी ने राज्य ओपन बोर्ड के परीक्षा आवेदन फार्म भरने का टेण्डर प्राईवेट सेक्टर के ‘आईसेक्ट’ को दिया गया है जो कि व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ‘आईसेक्ट’ यूनिवर्सिटी के संचालक से साठ-गांठ कर म.प्र.शासन के एम.पी. ऑनलाइन पोर्टल के साथ-साथ म.प्र.शासन के राजस्व की हानि पहुंचाई जा रही है।
चूंकि प्रभात राज तिवारी द्वारा संस्कृत बोर्ड के 10 हजार वंचित छात्रों को बजबूर कर संस्था संचालकों पर दबाव बनाकर म.प्र. राज्य मुक्त स्कूल शिक्षा बोर्ड में परीक्षा आवेदन फार्म भरवाने हेतु बाध्य / मजबूर किया जा रहा था क्योंकि प्रभातराज तिवारी द्वारा ‘आईसेक्ट’ युनिवर्सिटी के डायरेक्टर से सांठ-गांठ कर रखी है। आईसेक्ट के सेन्टर प्रदेशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित न होने से दूर दराज के छात्रों को म.प्र.राज्य ओपन बोर्ड के परीक्षा आवेदन फार्म नहीं भर पाते हैं जिनका भविष्य खराब हो रहा है।

विद्यालय संचालकों ने अम्बेडकर पार्क में धरने पर बैठे थे तब भी कोई निर्णय शासन ने नही लिया। विद्यालय संचालको ने स्कूल शिक्षा मंत्री से मिलकर अपनी बात रखने की कोशिश की परन्तु मंत्री बंगले में उपस्थित होने के बाद भी संचालको से नही मिले।मजबूरन विद्यालय संचालक कोर्ट जाने को मजबूर हुए।
कोर्ट ने क्या सुनाया निर्णय!





